अर्थ:- हे प्रभु! जिस सेवक के हृदय से अपनी मैं (अहम) को छुड़वा कर, तू (आत्मा का स्वरूप) दे देता हैं, (भाव- जिस गुरूमुख को परमात्मा अपने स्वरूप की झलक दिखला कर अहम को समाप्त कर देता है) इस अमूल्य वस्तु को वही सेवक प्राप्त कर सकता है।
अर्थ:- जिसको वह प्रभु कृपा करके, इस प्रकार का शरीर देता है, जिस शरीर में से परमात्मा का अनुभव हो जाए, उसको धारण करके उसका सेवक हो जाता है। और शेष मनुष्य, विचारों में घिरे हुए क्या कर सकते हैं? उन्हीं विचारों की ऊब डूब में भूले हुए, कुछ लोग ऐसे भी हैं जो परमात्मा से स्वयं को दूर एवं अलग समझ कर, इस भ्रम में भूले हुए, इधर-उधर दस दिशाओं में भटकते रहते हैं। कुछ ऐसे भी गुरूमुख प्रिय हैं जिन्होंने निर्गुण नाम के साथ मिलकर अपने जन्म को सफ़ल बना लिया।
Sukhmani Sehaj Gobind Gunn Naam Part-I
(Sukhmani Sahib Vyakhya)
Sukhmani Sehaj Gobind Gunn Naam Part-II
(Sukhmani Sahib Vyakhya)